जिम के 'सेल्फी' योद्धा
जिम के 'सेल्फी' योद्धा: वर्कआउट या फोटोशूट?
आजकल जिम जाना 'फिटनेस' के बारे में कम और 'कंटेंट क्रिएशन' के बारे में ज़्यादा हो गया है। पहले लोग पसीना बहाने जाते थे, अब लोग 'लाइटिंग' चेक करने जाते हैं।
जैसे ही आप जिम के अंदर कदम रखते हैं, आपको लोहे की आवाज़ कम और "क्लिक-क्लिक" की आवाज़ ज़्यादा सुनाई देती है।
द 'मिरर' माफिया (शीशे के सुल्तान)
जिम में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका वर्कआउट सिर्फ एक ही चीज़ के इर्द-गिर्द घूमता है— शीशा।
- ये लोग डंबल उठाते कम हैं, उसे हाथ में पकड़कर पोज़ ज़्यादा देते हैं।
- एक बाइसेप कर्ल मारेंगे, और फिर 5 मिनट तक शीशे में ऐसे देखेंगे जैसे उनकी बॉडी में अचानक से 'हल्क' की आत्मा घुस गई हो।
भाई, अभी तो तूने सिर्फ 2 किलो का डंबल उठाया है, इतनी जल्दी तो नसों में खून भी नहीं पहुंचा, तू 'एब्स' कहाँ ढूंढ रहा है?
'प्री-वर्कआउट' सेल्फी का नाटक
सबसे खतरनाक प्रजाति वो है जो जिम के गेट पर ही रुक जाती है।
- हाथ में 'शेकर' (Shaker) होगा जिसमें गुलाबी या नीले रंग का पानी होगा।
- चेहरे पर ऐसी गंभीर लुक होगी जैसे ये आज ही ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीतकर आएंगे।
- कैप्शन होगा: "नो पेन, नो गेन" या "मंडे मोटिवेशन"।
सच्चाई ये है कि उस सेल्फी के बाद अगले 40 मिनट वो बंदा सिर्फ बेंच पर बैठकर अपनी फोटो के लाइक्स गिनता है। भाई, तेरा 'पेन' तो सिर्फ अंगूठे में हो रहा है टाइपिंग करके!
द 'एंगल' एक्सपर्ट्स
जिम में कुछ लड़के-लड़कियां ऐसे 'योगा' पोज़ बनाते हैं जो बाबा रामदेव ने भी नहीं सोचे होंगे—सिर्फ इसलिए ताकि ट्राइसेप्स की एक लकीर दिख जाए।
"भाई, थोड़ा नीचे से फोटो खींच, पैर लंबे लगने चाहिए!"
"अरे, लाइट चेहरे पर नहीं, डोले (Biceps) पर आनी चाहिए!"
जिम अब जिम नहीं रहा, 'वोग' (Vogue) मैगजीन का कवर शूट बन गया है। अगर गलती से आप उनके फ्रेम में आ गए, तो वो आपको ऐसे देखेंगे जैसे आपने उनकी पुश्तैनी जायदाद हड़प ली हो।
पसीने का 'फिल्टर'
असली जिम वो होता था जहाँ लोग टी-शर्ट निचोड़ते थे। अब लोग 'ब्यूटी फिल्टर' लगाते हैं।
मैने ऐसे लोग देखे हैं जो पसीने वाली टी-शर्ट पहनकर आते हैं (घर से ही गीली करके!), ताकि लगे कि बहुत मेहनत की है। और फिर वही घिसा-पिटा गाना— "आरंभ है प्रचंड..."
भाई, तेरा 'आरंभ' तो ट्रेडमिल पर 2 मिनट चलने के बाद ही खत्म हो गया था, अब तो बस 'इंस्टाग्राम' चल रहा हैं।
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